जब आप फूलों को पहचानना छोड़
साइबर नेट में उलझे होते हैं
नासिका रंध्रों में जानी पहचानी
बारूदी गंध छाई होती है,
बच्चों के हाथ घरौंदे बनाने में, नहीं
खिलौना पिस्तौल चलाते होते हैं,
ऐसे में भी
कभी-कभी, कहीं-कहीं
वासंती बयार झूम ही आती है।
जब रात भयावह लंबी हो उठती है
सूरज को पहचानना भी मुश्किल
समाया होता है हरिण की आंखों में
भेडिय़े का खौफ
हाँ!
ऐसा होता है,
जब हमारे यहां चुनावी मौसम होता है
ऐसे में भी
कभी-कभी, कहीं-कहीं
वासंती बयार झूम ही आती है।
आपने कहा- बुरा समय है।
रोटी महंगी- सस्ती मजदूरी
सस्ता खून- महंगा पानी
मैंने माना- सच है
लड़कपन खोया, भूली जवानी
खटे नौकरानी, मजे भोगे रानी
परंतु
जीने को, गम मिटाने को
आसरा एक चाहिए ही होता है।
तल्ख वीराने में जब
छोड़ जाते हैं सब साथ
ऐसे में भी
कभी-कभी कविता
कहीं-कहीं
वासंती बयार झूम ही आती है।
कल रात
वसंत ने मेरा दरवाजा खटखटाया, पूछा-
क्या मैं आऊं?
मैंने कहा-
पृथ्वी पर स्वागत है।
आओ, उतरो हर घर-आंगन।
पूछा उसने-
पर कहां?
जल रही हर आंख में आग
ऐसे में कवि किस झंझट में घसीटते हो?
घर के कोने में बिठाना छोड़
दुनिया में जाने को कहते हो!
तभी
अबोध बालिका मेरी आई
वसंत को देख खिलखिलाई।
निश्छल किलक देख
वसंत भी मुस्काया।
कभी-कभी, कहीं-कहीं
वासंती बयार ऐसे ही झूम आती है?
रात जब दोपहर सी तपने लगे
बात गोली सी लगने लगे
फूल आंखों में चुभने लगें
ऐसे में
वसंत भला कैसे आये?
जब तक किसी की आंख न प्रेम झांक मुस्कराये।
यकीन मानिये!
वसंत आता ही है
कितना भी विपरीत हो मौसम
कितना भी विपरीत हो जीवन
ऐसे में भी
कभी-कभी, कहीं-कहीं
वासंती बयार झूम ही आती है।
बस, जरा-
आप प्रेम से देखिये तो सही।
कमलेश पांडेय
Monday, March 22, 2010
Wednesday, September 16, 2009
बात अधूरी/ जीवन अधूरा
कल
मैंने बहुत कोशिशें की
तुम्हें पुकारूं
कई बार आवाजें दीं
पर
गला रूंधा ही रहा
नहीं निकल रही थी
कोई आवाज
महसूस हुआ
गले में बंधा है
कोई पट्टा
जिसके दबाव में
चुप है मेरी जुबान।
चाहा
उतार फेंकू
उसे पर नामुमकिन
पट्टा रूप बदलता रहा
बहुरूपिया की भांति
कभी
भूख/ अहम / जरूरत/ समय की मांग
बन जकड़े रखा गला।
जानता हूं
गले का घुटे रहना
जुबान का बंद होना
काफी कष्टकर
सामने
तुम प्रिय
पर
बंद जुबान
किसी ने सच ही कहा था-
चलो हो चुका मिलना
न तुम खाली / न हम खाली।
साथी
सच है
तुम बिन
बात अधूरी
जीवन अधूरा।
-०-
कमलेश पांडेय
मैंने बहुत कोशिशें की
तुम्हें पुकारूं
कई बार आवाजें दीं
पर
गला रूंधा ही रहा
नहीं निकल रही थी
कोई आवाज
महसूस हुआ
गले में बंधा है
कोई पट्टा
जिसके दबाव में
चुप है मेरी जुबान।
चाहा
उतार फेंकू
उसे पर नामुमकिन
पट्टा रूप बदलता रहा
बहुरूपिया की भांति
कभी
भूख/ अहम / जरूरत/ समय की मांग
बन जकड़े रखा गला।
जानता हूं
गले का घुटे रहना
जुबान का बंद होना
काफी कष्टकर
सामने
तुम प्रिय
पर
बंद जुबान
किसी ने सच ही कहा था-
चलो हो चुका मिलना
न तुम खाली / न हम खाली।
साथी
सच है
तुम बिन
बात अधूरी
जीवन अधूरा।
-०-
कमलेश पांडेय
Friday, September 4, 2009
अभिव्यक्ति के खतरे
मैं अक्सर
चुप ही रहता हूं
क्योंकि
अभिव्यक्ति के खतरे बहुत हैं।
मेमने की तरह मिमियाते भी
लोमड़ियां अपने दांत पैना करने लगती हैं।
अक्सर
ऍसा होता है
नहीं चाहते हुए
हमारी दुम हिलने लगती है।
मैं नहीं समझ पाता -
आदमी क्यों कर डर जाता है
एक दूसरे से ?
सच
जान भी होंठ
चुप्पी साध लेते हैं
अखबारों की सुर्खियां
झूठ परसते नहीं थकतीं
किंतु
भूख से कांपते होंठों पर
जयकार टिका रहता है।
सच कहता हूं
अंधेरा घना है
ऍसे में
बोलने का खतरा
उठाना कठिन
पर
नहीं बोलने व मुर्दा पड़े होने में
कोई विशेष फर्क नहीं
सो
मैं बोलता हूं
आप सब से कुछ
फुसफुसाते हुए गुपचुप
यकीन मानिये
हममें से
अधिकतर
आज ऍसा ही करते हैं।
-०-
कमलेश पांडेय
चुप ही रहता हूं
क्योंकि
अभिव्यक्ति के खतरे बहुत हैं।
मेमने की तरह मिमियाते भी
लोमड़ियां अपने दांत पैना करने लगती हैं।
अक्सर
ऍसा होता है
नहीं चाहते हुए
हमारी दुम हिलने लगती है।
मैं नहीं समझ पाता -
आदमी क्यों कर डर जाता है
एक दूसरे से ?
सच
जान भी होंठ
चुप्पी साध लेते हैं
अखबारों की सुर्खियां
झूठ परसते नहीं थकतीं
किंतु
भूख से कांपते होंठों पर
जयकार टिका रहता है।
सच कहता हूं
अंधेरा घना है
ऍसे में
बोलने का खतरा
उठाना कठिन
पर
नहीं बोलने व मुर्दा पड़े होने में
कोई विशेष फर्क नहीं
सो
मैं बोलता हूं
आप सब से कुछ
फुसफुसाते हुए गुपचुप
यकीन मानिये
हममें से
अधिकतर
आज ऍसा ही करते हैं।
-०-
कमलेश पांडेय
कंक्रीट का जंगल
छोटे से ताल में
उतरे हैं
धवल पाखी
कंक्रीट के इस जंगल में।
धड़के हैं
हौले से कुछ शब्द
किसी के सीने में
सफेद पन्नों पर उतर आये हैं
रक्ताभ, उष्मित शब्द।
कविता बनती है
पढ़ी, गुनी जाती
भुला- बिसरा दी जाती है।
नित्य पंख पसार
उड़ते आते हैं
श्वेत श्याम पाखी
जन्म लेती है
नित्य नयी कविता
पर
पाखियों की भांति ही
महाकाश में विलीन हो जाती है
अपनी जगह
बदस्तूर
मुस्कराता है
कंक्रीट का जंगल।
-०-
कमलेश पांडेय
उतरे हैं
धवल पाखी
कंक्रीट के इस जंगल में।
धड़के हैं
हौले से कुछ शब्द
किसी के सीने में
सफेद पन्नों पर उतर आये हैं
रक्ताभ, उष्मित शब्द।
कविता बनती है
पढ़ी, गुनी जाती
भुला- बिसरा दी जाती है।
नित्य पंख पसार
उड़ते आते हैं
श्वेत श्याम पाखी
जन्म लेती है
नित्य नयी कविता
पर
पाखियों की भांति ही
महाकाश में विलीन हो जाती है
अपनी जगह
बदस्तूर
मुस्कराता है
कंक्रीट का जंगल।
-०-
कमलेश पांडेय
कसी लगाम
मैं
कई बार
कुछ कहना चाहता हूं
पाता हूं
मुंह पर कसी है
लगाम
और अब वे
सपनों पर भी हक जमाने की कर रहे हैं
आपस में बात।
हम
धृतराष्ट्र बनने को अभिशप्त
कारण
दौड़ रहा है
हमारी धमनियों में उनका नमक
व
टंगी है हमारी आंखों
भयावह कल की तस्वीरें।
सच
हममें से हरेक
जानता- पहचानता है
पर
धर्मराज युधिष्ठिर तक ने सिखायी है
हमें भाषा- नरो वा कुंजरो की।
बड़ा ही अच्छा लगता है
अपनी छोटी जरूरतों को
पूरा होते देखना।
भूल जाता है आदमी
सपनों के टूटने की पीड़ा
बस उसे साधनी पड़ती है
धृतराष्ट्र होने की कला।
-०-
कमलेश पांडेय
Monday, August 17, 2009
युवा मन
कई बार
मैंने पाया
मन
काफी पहले बूढ़ा हो गया
छुटपन में
पीठ पर लाद दिये गये
शब्दों के बोझ
अब तक नहीं उतार पाया।
बेजान पत्थर बन चुके शब्द
भार स्वरूप
कब तक ढोऊं
उन्हें अकेले
साथ बंटाने
नहीं कोई हाथ
लंबी डगर- अकेला सफर, औ
सिर पर अगिया वैताल
से नाचते शब्द
सुख
पता नहीं मारीचिका क्यों बना ?
बच्चे की आंख नहीं देख पाती है
अब सपने
क्रिकेट की गेंद
भले खींचती
अपनी ओर
पर
इम्तहान में नंबरों के भूत
मां- पिता की झिड़कियां
बच्चे
कब बूढ़ों में हुए तब्दील
नहीं मालूम
सच है
ओ युवा मन
बदलो
तुम समय- परिभाषा- अर्थ
वरना
दिखेंगे
अब सिर्फ
बौने- झुके
हम-तुम।
-०-
कमलेश पांडेय
मैंने पाया
मन
काफी पहले बूढ़ा हो गया
छुटपन में
पीठ पर लाद दिये गये
शब्दों के बोझ
अब तक नहीं उतार पाया।
बेजान पत्थर बन चुके शब्द
भार स्वरूप
कब तक ढोऊं
उन्हें अकेले
साथ बंटाने
नहीं कोई हाथ
लंबी डगर- अकेला सफर, औ
सिर पर अगिया वैताल
से नाचते शब्द
सुख
पता नहीं मारीचिका क्यों बना ?
बच्चे की आंख नहीं देख पाती है
अब सपने
क्रिकेट की गेंद
भले खींचती
अपनी ओर
पर
इम्तहान में नंबरों के भूत
मां- पिता की झिड़कियां
बच्चे
कब बूढ़ों में हुए तब्दील
नहीं मालूम
सच है
ओ युवा मन
बदलो
तुम समय- परिभाषा- अर्थ
वरना
दिखेंगे
अब सिर्फ
बौने- झुके
हम-तुम।
-०-
कमलेश पांडेय
Sunday, August 16, 2009
आजादी
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर
कल
मैंने सोचा
मिली कौन सी आजादी है
मुझे ?
अपने बास को देख
किसी
कुत्ते की पूंछ सी अचानक झुक जाता हूं
मैं क्यों ?
सुना मैंने
आजादी हमें देती है
बराबरी का अधिकार
सिर उठा बात कह पाने
का साहस
पर नहीं,
पाया मैंने
हममें काफी कुछ
अब भी
जंजीरों से जकड़ा है
हमारे सपने, हमारे वेतन
हमारी खुशियां, हमारा समय
सब कुछ तो
अब भी कैद है।
बस
कैद करने वाली मुठ्ठियां बदली हैं
बदले हैं वे गुनहगार चेहरे।
जिनके
हृदय में ठहाके लगा रहे हैं
खौफनाक भेड़िये
वे चेहरे पर हंसी बिखेरे
हमारे सामने परसते हैं
अपनी खैरात।
गुलामी अब भी कायम है
समय पर उनकी जकड़ है
सपनें बदशक्ल हैं
हम सब बंटे हैं।
-०-
कमलेश पांडेय
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