Sunday, February 22, 2009
Tuesday, February 10, 2009
राजरंग
बढता चल तू , चाहे सामने हो अग्रिपथ कमलेश पांडेय
और हादसों भरा साल बीत ही गया। कैसी बिडंबना है कि अधिकतर समय साल बीतते-बीतते कोई न कोई जख्म दे जाता है। पिछले कुछ सालों से ऐसा ही दस्तूर बना हुआ है। कभी सुनामी, कभी अन्य प्राकृतिक दुर्घटनाएं, तो कभी संसद भवन पर हमला जैसे मानव जनित कांड। लेकिन इस साल नवंबर महीने में ही महज दस पाकिस्तानी युवकों ने मुंबई में इस कदर तबाही मचायी, जिसे बरसों भुला पाना संभव नहीं होगा। काम से लौट रहे तथा अन्य स्थानों के लिए रवाना होने शिवाजी छत्रपति टर्मिनल स्टेशन पर पहुंचे आम यात्रियों पर अत्याधुनिक आग्रेयास्त्रों से ताबडतोड गोलीबारी, कामाजी अस्पताल के सामने एसटीएफ के प्रमुख हेमंत करकरे, पुलिस के अतिरिक्त कमिश्नर अजय कामटे तथा अधिकारी विजय सालेस्कर को गोलियों से छलनी कर दिया जाना, सोलह पुलिस अधिकारियों, जवानों की शहादत, कई विदेशी तथा सैकडों बेकसूर आम लोगों की मौत को इतनी सहजता से भुलाया नहीं जा सकता है।
इस आतंकी घटना में पकडे गये एकमात्र जीवित पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब ने स्वीकार किया है कि उस जैसे कई युवकों को लश्कर ए तैयबा की ओर से आतंकवादी हमले का प्रशिक्षण पाकिस्तान में दिया गया था। एक जिन्स की पैंट अपने गरीब रेहडी लगाने वाले पिता द्वारा नहीं दे पाने के कारण, घर छोड देने वाले कसाब ने आम लोगों की तरह पहले दिहाडी मजदूरी, फिर छोटे-मोटे अपराध किये। पर महात्वाकांक्षा उसे लश्कर ए तैयबा के चंगुल तक ले गयी। जिहाद के नाम पर भारत में मुसलमानों पर हो रहे कथित अत्याचार की वीडियो क्लिपिंग दिखा उसके मन में भारत के प्रति नफरत भरा गया। कमोबेश यही किस्सा अन्य पाकिस्तानी युवा आतंकवादियों के साथ भी घटा होगा। अपने वास्तविक दुश्मन से अनजान ये गुमराह युवा सहजता से ऐसे सियासतदानों के हत्थे चढ जाते हैं, जिनका मजहब दीन- ईमान नहीं बल्कि आतंक फैलाने के नाम पर दुनिया से इमदाद बटोरना है। धर्म के नाम पर धंधा बडा ही सहज होता है। बाज लोग सहजता से बहकावे में आ जाते हैं। सोचने- समझने की जहमत कौन मोल ले? कसाब भी कौन सा पढा लिखा समझदार था ? महज सात- आठ दर्जे तक पढा लडका। इस्लाम के नाम पर कुर्बान होने पर जन्नत मिलने और कुर्बान होने पर उसके परिवारवालों को डेढ लाख रुपये का मुआवजा मिलने का भरोसा। इतना काफी था, दुनिया से ऊबे युवा के गुमराह होने के लिए। जब बडे बडे विद्वान भी सामयिक भावनाओं में बह जाते हैं तथा समय तथा काल के सापेक्ष बयान जारी कर आग को बढावा देने लगते हैं, ऐसे में कुछ नासमझ युवकों के पास इतनी समझ ही कहां कि वे विचार कर पाते कि उनकी इन हरकतों का परिणाम क्या होगा? अब देखिये किस प्रकार केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ए आर अंतुले ने आतंकवादी हमले के दौर में हेमंत करकरे तथा अन्य दोनों अधिकारियों की शहादत पर ही सवाल खडा कर खुद तो अपनी फजीहत करायी ही, वहीं कांग्रेस को भी कटघरे में खडा कर दिया है। भले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया है लेकिन वे अपने सवाल पर डटे हुए हैं कि आखिरकार ये तीनों अधिकारी 26 नवंबर की रात कामा अस्पताल क्यों गये थे? अंतुले ने साफ- साफ तो नहीं कहा लेकिन इशारा सीधे सीधे साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर तथा मालेगांव विस्फोट से जुडे सैनिक अधिकारियों की सांठगांठ के जांच कार्य की ओर कर रहा था, जो आतंकवादी निरोधक दस्ता के प्रमुख हेमंत करकरे की निगरानी में जारी था। अंतुले ने खुल कर तो कुछ नहीं कहा लेकिन उनका संकेत था कि कहीं इन अधिकारियों की हत्या में मालेगांव विस्फोट से जुडे लोगों के हाथ तो नहीं थे? बहरहाल शहीद हेमंत करकरे की मौत के बाद गुजरात की भाजपा सरकार की ओर से शहीद की विधवा के लिए आर्थिक मदद की पेशकश की गयी, जिसे शहीद हेमंत की पत्नी ने नकार दिया। दुर्भाग्य है कि देश में सुरक्षा के मुद्दे पर भी जमकर राजनीति की जाती है। आरोप- प्रत्यारोप के बीच घोटाले भी देश में आम हैं। देश की जनता बोफोर्स तोप के नाम पर देश में वर्षों से जारी राजनीति से भली भांति परिचित है। इसी प्रकार सन 1992 में उछला श्रीरामचंद्र जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद का मुद्दा भी कथित बाबरी मस्जिद के ढांचे के टूट जाने के बाद अदालतों की धूल फांक रहाहै। मंदिर बनाने के लिए देश भर से एकत्र क्ये गये ईंट पता नहीं कहां की धूल फांक रहे हैं? चंदे का हिसाब मांगना तो भगवान के काम में पाप ही होगा? रामलला मंदिर से बेघर हो गये हैं तथा इन दिनों कडे पहरे में अस्थायी मंदिर में विराज रहे हैं। दरअसल इस मौके पर इस घटना की याद इसलिए आवश्यक है क्योंकि समझदारी से इतर देश का मध्यमवर्गीय समाज सामयिक धार्मिक, जातिगत तथा भाषाई उन्माद में डूब जाता है और लम्हों की खता को सदियां भुगतती हैं। धर्म की सही व्याख्या के अभाव में कठमुल्लापन आम मानसिकता पर हावी हो जाता है और षडंत्रकारी दिमाग बखूबी इन स्थितियों को भुनाना अच्छी तरह जानते हैं। कुछ लोगों के लिए राजनीति उनका धर्म होती है तो कुछ धर्म को ही अपनी राजनीति का आधार बना लेते हैं। कसाब तथा उसके समान दसों पाकिस्तानी युवकों के मन में इसी धार्मिक असहिष्णुता को उकसावा देकर उन्हें ऐसे अमानवीय कार्य के लिए प्रेरित कर पाना अत्यंत सहज था। देश को याद है, प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सन 1984 में उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किये जाने की सूचना देश में फैलते ही हजारों निरपराध सिख परिवारों को किस कदर त्रासदी झेलनी पडी थी? आगजनी, हत्या, लूटपाट की बातों को याद दिलाने की आवश्यकता है क्या ? बहुत ही आसान होता है किसी की ओर उंगली उठा देना। परंतु याद रखने की जरूरत है कि किसी की ओर उंगली उठाने पर तीन उंगलियां हमें भी अपनी जांच पडताल करने को कहती हैं। बात भले ही कटु लगे लेकिन हमें ठहर कर सोचने की जरूरत है कि हमारे देश में धर्म, राजनीति, विश्वास, विकास, सहयोग, सहज व स्वस्थ जीवन के प्रति हमें कौन सा रवैया अपनाने की जरूरत है ? दुर्भाग्य है कि हम धर्म का मसला धार्मिक ठेकेदारों तथा राजनीति का मसला अधकचरे राजनीतिज्ञों पर छोड देते हैं, जो स्थितियों को हमारे लिए इतनी जटिल कर देते हैं कि हमारे सामने संस्कारों से जकडी हमारी मानसिकता के साथ बहकने के सिवा हमारे पास कोई चारा ही नहीं बचता है। हम सब कमोबेश उन्माद के शिकार सहजता से हो जाते हैं। आक्रोश के क्षणों में विवेक को खोकर महज तात्कालिक प्रतिक्रिया जताने में ही हमारी सार्थकता खत्म हो जाती है। द्विराष्ट्र के आधार पर भारत के विभाजन के बाद मिली आजादी के उपरांत पाकिस्तान के हुक्मरान तो पेट पर कपडे बांध कर हजार सालों तक भारत के साथ युद्ध करने के नारे लगा बाहबाही लूटने की कोशिश करते हैं, जबकि हकीकत में युद्ध के कारण वहां परिस्थितियां बिगडती ही गयीं। जिस मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान का सपना देखा और पाकिस्तान के निर्माण में जिनकी अहम भूमिका रही, उन्होंने भी वहां जम्हूरियत (लोकतंत्र) की ही कल्पना की थी, न कि उसके इस्लामिक राष्ट्र के स्वरूप की। बहरहाल बाद में इस्लामिक राष्ट्र घोषित होने के बाद भी क्या वहां इस्लामिक व्यवस्था (समानता का अधिकार)कायम है? लगातार फौजी शासकों के उलट-फेर के बीच वहां की जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित है तथा शासन के नाम पर वहां भी उन्हें शोषण का शिकार होना पड रहा है। कश्मीर का मुद्दा पाकिस्तान सालों से उछालता रहा है, जबकि दुनिया जानती है कि पाक कबायलियों के हमले से लाचार होकर कश्मीर रिसायत के राजा हरि सिंह ने भारत में अपनी रिसायत का विलय कर दिया था। वहीं पाकिस्तानी कब्जे वाले आजाद कश्मीर की क्या स्थिति है, दुनिया वाले बखूबी जानते हैं। धर्म के आधार पर किसी राष्ट्र की सार्वभौमिकता हमेशा कायम रहेगी, इस अवधारणा को भी पूरी तरह नकारते हुए तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में भाषायी आंदोलन तथा शोषण के खिलाफ मुक्ति संग्राम के नेतृत्व में आंदोलन छिडा, फलस्वरूप सन 1972 में बांग्लादेश नामक राष्ट्र का अभ्युदय हुआ। इस युद्ध में भारत और विशेषकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की भूमिका इक कदर अहम थी कि वह चोट अब तक पाकिस्तान नहीं भूल पाया है। इन बातों का प्रतिशोध वहां के हुक्मरान, फौज तथा आईएसआई वाले घुसपैठ तथा अन्य आतंकवादी तरीकों व जाली नोटों, मादक पदार्थों की तस्करी द्वारा ले रहे हैं। वहीं बांग्लादेश की आजादी के समय भारत में शरणार्थियों की संख्या इस कदर बेतहाशा बढी कि आज देश के सामने यह एक प्रमुख समस्या है। साथ ही सीमा पर भ्रष्ट सुरक्षाकर्मियों के कारण बांग्लादेश से मानव, हथियारों तथा उपभोक्ता सामग्रियों की तस्करी सरेआम जारी है। आज भारत में मुस्लिम समुदाय के साथ शोषण का आरोप लगाने वाले पाकिस्तान में झांक कर देखें, मस्जिदों में नमाज के दौरान चलती गोलियों की आवाजें उन्हें सुनायी देंगी। कई बार शिया व सुन्नियों के झगडे के बीच वहां सडकों पर टैंक तक उतारनी पडी है। कर्ज में डूबे बांग्लादेश तथा पाकिस्तान के विकास पर उन्हें नजर दौडानी चाहिए। किंतु हमारे देश में भी बडी विडंबनाएं हैं। एक ओर देश चांद पर पहुंच रहा है, वहीं अब तक हम सब देश में आम लोगों तक विकास के संसाधन नहीं पहुंचा पाये हैं, जिसके कारण उपजे विभेद से भारी असंतोष पनप रहा है। कभी देश के महज 6 जिलों में माओवादियों की पैठ थी लेकिन अब आंध्रप्रदेश, उडीसा, बंगाल, झारखंड,महाराष्ट्र, छत्तीसगढ, उत्तरप्रदेश के कई जिलों में माओवादियों का प्रभाव क्यों चिंताजनक रूप से बढ रहा है, इस पर ध्यान दिये जाने की जरूरत है। हिंसा हमें कहीं नहीं पहुंचाती। दहशतगर्दी से कुछ भी हासिल नहीं होता। इस बात को समझने और समझाने की निहायत जरूरत है। जरूरत है लोकतंत्र में दबे कुचले लोगों के आवाजों को बुलंद करने की। इसके लिए लोकतंत्र में तमाम व्यवस्थाएं हैं। संगठित होकर समाज में पिछडे लोग सामने आयें। अपने अधिकारों के प्रति सचेत हों। यह उनका नैतिक कर्तव्य है।
Monday, February 9, 2009
Thursday, September 18, 2008
नयी भोर
किसी नयी भोर
की तलाश में
गीता गाता
सो गया था
पहला कवि
पृष्ठ दर पृष्ठ
गुंजरित रहा
एक ही शब्द -
प्रेम।
अंधेरे ने जगायी
जुगुप्सा
उत्पन्न किये मतभेद
कवि की यही पीड़ा
चिर प्रेम- नयी सुबह।
पर,
जान लो-
प्रेम के लिए
नितांत आवश्यक-
साम्य,
नयी सुबह के लिए-
एक समाज।
-००-
आजाद सपनों के लिए
कई बार मैं
अपने बेतरतीब सपने
तरतीब में सजाना चाहता हूं,
पाता हूं -
सपनों के छोर
किसी की मुट्ठियों में कैद हैं।
यकीन मानिए-
कई बार बिना
सपनों के अपने होने पर
मुझे विश्वास नहीं होता।
बिना सपनों के
भला आदमी होता है।
लेकिन साथी-
कसी मुट्ठियों में जकड़े सपनों
को पाने का सपना
अभी अधूरा है-
इसी संघर्ष के लिए है- कविता।
-००-
फासले लंबे हैं
स्वप्न ही तो था,
देखा मैंने
मिट गया था फासला
आदमी से आदमी के बीच का।
धुआं उगलती
अधकच्ची लकड़ियों पर
रोटी थापते हाथ
और
ओवनों में कार्यरत चिकने हाथ।
मैं समझा-
अब नहीं है फासला।
कर्मठ हैं सभी हाथ
और
कर्मठ हाथों के बीच नहीं होते फासले।
पर, पाया
अधकच्ची लकड़ियों
पर बनी चीकट रोटी
मलुआ को खिला
वे हाथ
अब
ओवन की सफाई में जुट गये हैं
और
ओवन वाले हाथ
संवार रहे अपने नाखून।
टूटा स्वप्न,
अभी तय करनी हैं मंजिलें
नहीं मिटा है फासला
आदमी से आदमी के बीच का।
-००-
फीनिक्स जीवित है
फीनिक्स की तरह
एक बार फिर
अपने क्षार से
उठ खड़ा होऊंगा, मैं।
मेरी आस्था
मुझे क्षार
नहीं होने देगी।
बाध्य करेगी मुझे
तुम फिर- फिर जियो
और
नित नयी आस्था-अनास्था
राग-रंग
अनुराग-विराग के भर रंग
नये संकल्प के संग
एक शिशु फीनिक्स
आसमान में उड़ान के लिए
तैयार मिलेगा
-००-
मदारी और डुगडुगी
मैं मदारी हूं
डुगडुगी बजाता हूं,
बजते हैं
तरह-तरह के बोल।
कुछ
आप सुनते हैं
कुछ गुनते हैं
कुछ चुप रह भूलते हैं।
हां---
सारे राग
मैं एक साथ नहीं बजाता
कुछ
आप पर भी छोड़ता हूं -
सुनिये- समझिये.....
डुगडुगी बजती है
कभी मध्यम, कभी तेज
पर, जानते हैं, आप
डुगडुगी का अपना स्वर नहीं
डुगडुगी में आप ही बोलते हैं
डुगडुगी में आप ही होते हैं।
सच-
कई बार ऐसा भी होता है
आप होते हैं
पर आप नहीं होते हैं।
यकीन मानिये....
जब-जब ऐसा होता है
तभी
डुगडुगी का स्वर बदलता है
और
जब स्वर बदलता है
तभी दुनिया करवट बदलती है।
हां, हुजूर
जब आप अपने आप में नहीं होते
तभी तो वह सब कुछ घटता है
जिसके विरोध में
डुगडुगी आप बज उठती है।
-००-
कठपुतली
कई बार
ऐसा भी होता है,
बात समझते हुए भी
समझ नहीं आती।
यकीन मानिए-
हम कठपुतली भर होते हैं।
-००-
अधूरा विषपान
शिव
सुना था
तुमने पान किया था
संपूर्ण मंथित गरल
पर आज भी
क्यों
उबाल मारता है
धमनियों में विष
और
बिखर उठता है लहू सड़कों पर
दंगों के बाद।
-००-
किसकी गलती
मैं तूलिका उठा
सुनहरे चित्र
आंकना चाहता हूं
पर
सारे रंग स्याह क्यों
इन्सान की जगह भेड़ियों
और
जानवरों की जगह
इन्सान के अक्श
खुद ब खुद
उभर आये क्यों
हैरान
सोचता हूं
यह मेरी गलती है
या किसी और की।
-००-
यक्ष प्रश्न
दंगे में मृत
अबोध के होठ
ठहरा था
यक्ष प्रश्न-
मेरा कसूर क्या है।
पर पूछता हूं, आपसे-
क्यों चुप हैं।
-००-
गठजोड़
कैसा लगता है, तुम्हें
जब कुछ
शब्द आपसे में गठजोड़ कर लेते हैं
और बन जाती है कविता।
क्या वैसा ही लगता है-
जब छा जाते हैं
गठजोड़ करते राजनीति के वामन
और लघु
हो उठता है मानव।
सच है....
पीठ पर बस्ता लादे
बच्चे की आंखों के भाव
सहसा बदल जाते हैं
जब
वे पाते हैं
कविता आज महज
आंखों में टिके स्वप्न का नाम भर है
वामनों ने माप रखी है पृथ्वी।
-००-
सुनामी तो सिर्फ एक नाम भर है
अभी - अभी
वह क्षण यहां से गुजर गया
अपने सहस्त्र फण में कुछ फण
उसने बदले थे
हां-
भार भी तो बढ़ चला है
खासकर
जबसे जमकर भारी हो चले हैं-
रिश्ते-भाव-संवेदना-उष्मा-संबंध।
बोझिल होती
जिंदगी- क्षण
ऐसे में वाहक को आराम कहां।
हरक्युलिस ने भी तो कांधे बदलने चाहे थे
दरअसल
थके कांधे
अब भार उठाने में अक्षम
किंतु
भार हो
किसके कांधे- किसके सिर
कौन करेगा वहन
सिर्फ वहन।
बोझ दबे लरजते पांव
देख कांपा- फटा होगा
उसका सीना
जिसने अपने गर्भ में धारण किया
अन्न- संतति।
खारे आंसू बहुत कुछ गला सकते हैं-
मृदुल मृदु की बिसात ही क्या।
सुनामी को सिर्फ एक नाम भर है।
सच-
जिन्होंने सिर्फ ढोया भार
शापित सिसिफस की भांति,
सभ्यता जिनके कंधे रही
वेताल की भांति सवार-
के तेजाबी आंसुओं से
विगलित
उसने बदला होगा फण।
हां
धड़का होगा पृथ्वी का हृदय
और सुनामी गुजरा होगा।
हर उन आंखों
रोज ऐसे लाखों सुनामी गुजरते हैं
जिनके सिर तुम सवार।
दीगर है
तुम अडिग
ओ प्रस्तर प्रतिमा।
-००-
प्रतीक्षा में
मैं जानता हूं
नववर्ष
समय के सुनहले पक्षी के पांखों सवार
नहीं उतरेगा
हमारे घर- आंगन।
नहीं होगी कोई ऐसी नयी सुबह
जब चहक उठेंगी दिशाएं।
रोज की तरह
सूरज उठा देगा हमें
कारखाने के सायरन की तरह
और
जल्द तैयार हो
निकल पड़ेंगे हम
सड़कों पर
आने वाले
किसी सुनहले समय की प्रतीक्षा में।
-००-
सुबह होगी
सुबह होगी
चिड़ियाएं फुदकेंगी
बच्चे दौड़ेंगे
कारखानों के चक्के चलेंगे
खेतों की फुनगी पर
सुनहली बालियां झूमेंगी।
सुबह होगी
अंधेरा छटेगा
आंखें मिलेंगीं
पहचानेंगे चेहरे
झुकेंगी- शर्मसार होंगी आंखें
और
कंधे पर
हथियार नहीं
हल होगा।
सुबह जरूर होगी।
-००-
एक गीत
एक गीत
तुम्हारे थके कांधे के लिए
पसीने से भीगी
तुम्हारी लट के लिए,
उस क्षण के लिए
जब
आकाश ताकते
तुम बैठ जाते हो थक-हार।
एक गीत
खुशी के छलकते कतरे के लिए
तुम्हारी आंखों
झिलमिलाते टंगे सपनों के लिए
और
उस क्षण के लिए
जब अंतस में तुम्हारे
उमड़ता है उल्लास।
एक गीत ही तो
मेरी भेंट
जिससे
कह-सुन पाते
हम अपनी बात।
-००-
विष रोपण
मैं विष बोता हूं
वर्तमान के सीने में।
जानता हूं
विष रोपण का फल
पर यही मेरा व्यापार।
विष ही मेरे लिए सोना उगलता
जिसकी अधिकता से कायम
मेरी चौधराहट।
क्योंकि बांट सकता हूं
अनुदान
कुत्ते के टुकड़ों की तरह
भोपाल हो या मैक्सिको
फर्क नहीं पड़ने देता मैं
हो यह मेरे विष का प्रतिफल
या प्रकृति की हो विध्वंसक लीला।
विष बहुत मधुर
लोग लालायित
स्वयं विषपान के लिए
क्योंकि
अनुदान के खोल लपेट
दोस्ती और फर्ज के नाम देता मैं भेंट
और
चाहता हूं
कि उसका पड़ोसी भी
मेरी ओर हाथ बढ़ाये
जिससे
थमा संकू
उसके हाथों में भी
कोई विष वेल।
मैं सफल अपने व्यापार में
क्योंकि
तमाम विष वृक्ष लहरा - लहरा
कर रहे हर्ष प्रकट।
सच
दुनिया बहुत
मधुर विषैली है।
-००-
संचेतना
जडांधकार
को बेधती हुई
रोशनी की किरण
कौंधी है आज
शब्द
मूर्तरूप
बिखेर रही हैं रश्मियां
और
छंट रहा है
क्षितिज का तिमिर।
-००-
फर्क
जड़ हो जाते हैं जब हम
संवेदना शून्य
और आंखें देखते हुए भी नहीं देखतीं
मन
नहीं ग्राह्य कर पाते हैं शब्दों के अर्थ
तब
कविता के धड़कते शब्द
जगाते हमारी
संचेतना।
फर्क महसूस कर पाते हम
आदमी और भेड़िये के बीच का
-००-
किसी नयी भोर
की तलाश में
गीता गाता
सो गया था
पहला कवि
पृष्ठ दर पृष्ठ
गुंजरित रहा
एक ही शब्द -
प्रेम।
अंधेरे ने जगायी
जुगुप्सा
उत्पन्न किये मतभेद
कवि की यही पीड़ा
चिर प्रेम- नयी सुबह।
पर,
जान लो-
प्रेम के लिए
नितांत आवश्यक-
साम्य,
नयी सुबह के लिए-
एक समाज।
-००-
आजाद सपनों के लिए
कई बार मैं
अपने बेतरतीब सपने
तरतीब में सजाना चाहता हूं,
पाता हूं -
सपनों के छोर
किसी की मुट्ठियों में कैद हैं।
यकीन मानिए-
कई बार बिना
सपनों के अपने होने पर
मुझे विश्वास नहीं होता।
बिना सपनों के
भला आदमी होता है।
लेकिन साथी-
कसी मुट्ठियों में जकड़े सपनों
को पाने का सपना
अभी अधूरा है-
इसी संघर्ष के लिए है- कविता।
-००-
फासले लंबे हैं
स्वप्न ही तो था,
देखा मैंने
मिट गया था फासला
आदमी से आदमी के बीच का।
धुआं उगलती
अधकच्ची लकड़ियों पर
रोटी थापते हाथ
और
ओवनों में कार्यरत चिकने हाथ।
मैं समझा-
अब नहीं है फासला।
कर्मठ हैं सभी हाथ
और
कर्मठ हाथों के बीच नहीं होते फासले।
पर, पाया
अधकच्ची लकड़ियों
पर बनी चीकट रोटी
मलुआ को खिला
वे हाथ
अब
ओवन की सफाई में जुट गये हैं
और
ओवन वाले हाथ
संवार रहे अपने नाखून।
टूटा स्वप्न,
अभी तय करनी हैं मंजिलें
नहीं मिटा है फासला
आदमी से आदमी के बीच का।
-००-
फीनिक्स जीवित है
फीनिक्स की तरह
एक बार फिर
अपने क्षार से
उठ खड़ा होऊंगा, मैं।
मेरी आस्था
मुझे क्षार
नहीं होने देगी।
बाध्य करेगी मुझे
तुम फिर- फिर जियो
और
नित नयी आस्था-अनास्था
राग-रंग
अनुराग-विराग के भर रंग
नये संकल्प के संग
एक शिशु फीनिक्स
आसमान में उड़ान के लिए
तैयार मिलेगा
-००-
मदारी और डुगडुगी
मैं मदारी हूं
डुगडुगी बजाता हूं,
बजते हैं
तरह-तरह के बोल।
कुछ
आप सुनते हैं
कुछ गुनते हैं
कुछ चुप रह भूलते हैं।
हां---
सारे राग
मैं एक साथ नहीं बजाता
कुछ
आप पर भी छोड़ता हूं -
सुनिये- समझिये.....
डुगडुगी बजती है
कभी मध्यम, कभी तेज
पर, जानते हैं, आप
डुगडुगी का अपना स्वर नहीं
डुगडुगी में आप ही बोलते हैं
डुगडुगी में आप ही होते हैं।
सच-
कई बार ऐसा भी होता है
आप होते हैं
पर आप नहीं होते हैं।
यकीन मानिये....
जब-जब ऐसा होता है
तभी
डुगडुगी का स्वर बदलता है
और
जब स्वर बदलता है
तभी दुनिया करवट बदलती है।
हां, हुजूर
जब आप अपने आप में नहीं होते
तभी तो वह सब कुछ घटता है
जिसके विरोध में
डुगडुगी आप बज उठती है।
-००-
कठपुतली
कई बार
ऐसा भी होता है,
बात समझते हुए भी
समझ नहीं आती।
यकीन मानिए-
हम कठपुतली भर होते हैं।
-००-
अधूरा विषपान
शिव
सुना था
तुमने पान किया था
संपूर्ण मंथित गरल
पर आज भी
क्यों
उबाल मारता है
धमनियों में विष
और
बिखर उठता है लहू सड़कों पर
दंगों के बाद।
-००-
किसकी गलती
मैं तूलिका उठा
सुनहरे चित्र
आंकना चाहता हूं
पर
सारे रंग स्याह क्यों
इन्सान की जगह भेड़ियों
और
जानवरों की जगह
इन्सान के अक्श
खुद ब खुद
उभर आये क्यों
हैरान
सोचता हूं
यह मेरी गलती है
या किसी और की।
-००-
यक्ष प्रश्न
दंगे में मृत
अबोध के होठ
ठहरा था
यक्ष प्रश्न-
मेरा कसूर क्या है।
पर पूछता हूं, आपसे-
क्यों चुप हैं।
-००-
गठजोड़
कैसा लगता है, तुम्हें
जब कुछ
शब्द आपसे में गठजोड़ कर लेते हैं
और बन जाती है कविता।
क्या वैसा ही लगता है-
जब छा जाते हैं
गठजोड़ करते राजनीति के वामन
और लघु
हो उठता है मानव।
सच है....
पीठ पर बस्ता लादे
बच्चे की आंखों के भाव
सहसा बदल जाते हैं
जब
वे पाते हैं
कविता आज महज
आंखों में टिके स्वप्न का नाम भर है
वामनों ने माप रखी है पृथ्वी।
-००-
सुनामी तो सिर्फ एक नाम भर है
अभी - अभी
वह क्षण यहां से गुजर गया
अपने सहस्त्र फण में कुछ फण
उसने बदले थे
हां-
भार भी तो बढ़ चला है
खासकर
जबसे जमकर भारी हो चले हैं-
रिश्ते-भाव-संवेदना-उष्मा-संबंध।
बोझिल होती
जिंदगी- क्षण
ऐसे में वाहक को आराम कहां।
हरक्युलिस ने भी तो कांधे बदलने चाहे थे
दरअसल
थके कांधे
अब भार उठाने में अक्षम
किंतु
भार हो
किसके कांधे- किसके सिर
कौन करेगा वहन
सिर्फ वहन।
बोझ दबे लरजते पांव
देख कांपा- फटा होगा
उसका सीना
जिसने अपने गर्भ में धारण किया
अन्न- संतति।
खारे आंसू बहुत कुछ गला सकते हैं-
मृदुल मृदु की बिसात ही क्या।
सुनामी को सिर्फ एक नाम भर है।
सच-
जिन्होंने सिर्फ ढोया भार
शापित सिसिफस की भांति,
सभ्यता जिनके कंधे रही
वेताल की भांति सवार-
के तेजाबी आंसुओं से
विगलित
उसने बदला होगा फण।
हां
धड़का होगा पृथ्वी का हृदय
और सुनामी गुजरा होगा।
हर उन आंखों
रोज ऐसे लाखों सुनामी गुजरते हैं
जिनके सिर तुम सवार।
दीगर है
तुम अडिग
ओ प्रस्तर प्रतिमा।
-००-
प्रतीक्षा में
मैं जानता हूं
नववर्ष
समय के सुनहले पक्षी के पांखों सवार
नहीं उतरेगा
हमारे घर- आंगन।
नहीं होगी कोई ऐसी नयी सुबह
जब चहक उठेंगी दिशाएं।
रोज की तरह
सूरज उठा देगा हमें
कारखाने के सायरन की तरह
और
जल्द तैयार हो
निकल पड़ेंगे हम
सड़कों पर
आने वाले
किसी सुनहले समय की प्रतीक्षा में।
-००-
सुबह होगी
सुबह होगी
चिड़ियाएं फुदकेंगी
बच्चे दौड़ेंगे
कारखानों के चक्के चलेंगे
खेतों की फुनगी पर
सुनहली बालियां झूमेंगी।
सुबह होगी
अंधेरा छटेगा
आंखें मिलेंगीं
पहचानेंगे चेहरे
झुकेंगी- शर्मसार होंगी आंखें
और
कंधे पर
हथियार नहीं
हल होगा।
सुबह जरूर होगी।
-००-
एक गीत
एक गीत
तुम्हारे थके कांधे के लिए
पसीने से भीगी
तुम्हारी लट के लिए,
उस क्षण के लिए
जब
आकाश ताकते
तुम बैठ जाते हो थक-हार।
एक गीत
खुशी के छलकते कतरे के लिए
तुम्हारी आंखों
झिलमिलाते टंगे सपनों के लिए
और
उस क्षण के लिए
जब अंतस में तुम्हारे
उमड़ता है उल्लास।
एक गीत ही तो
मेरी भेंट
जिससे
कह-सुन पाते
हम अपनी बात।
-००-
विष रोपण
मैं विष बोता हूं
वर्तमान के सीने में।
जानता हूं
विष रोपण का फल
पर यही मेरा व्यापार।
विष ही मेरे लिए सोना उगलता
जिसकी अधिकता से कायम
मेरी चौधराहट।
क्योंकि बांट सकता हूं
अनुदान
कुत्ते के टुकड़ों की तरह
भोपाल हो या मैक्सिको
फर्क नहीं पड़ने देता मैं
हो यह मेरे विष का प्रतिफल
या प्रकृति की हो विध्वंसक लीला।
विष बहुत मधुर
लोग लालायित
स्वयं विषपान के लिए
क्योंकि
अनुदान के खोल लपेट
दोस्ती और फर्ज के नाम देता मैं भेंट
और
चाहता हूं
कि उसका पड़ोसी भी
मेरी ओर हाथ बढ़ाये
जिससे
थमा संकू
उसके हाथों में भी
कोई विष वेल।
मैं सफल अपने व्यापार में
क्योंकि
तमाम विष वृक्ष लहरा - लहरा
कर रहे हर्ष प्रकट।
सच
दुनिया बहुत
मधुर विषैली है।
-००-
संचेतना
जडांधकार
को बेधती हुई
रोशनी की किरण
कौंधी है आज
शब्द
मूर्तरूप
बिखेर रही हैं रश्मियां
और
छंट रहा है
क्षितिज का तिमिर।
-००-
फर्क
जड़ हो जाते हैं जब हम
संवेदना शून्य
और आंखें देखते हुए भी नहीं देखतीं
मन
नहीं ग्राह्य कर पाते हैं शब्दों के अर्थ
तब
कविता के धड़कते शब्द
जगाते हमारी
संचेतना।
फर्क महसूस कर पाते हम
आदमी और भेड़िये के बीच का
-००-
Sunday, September 14, 2008
कल ऐसा ही होगा
कल उनका जिक्र
सिर्फ दस्तावेजों में होगा
जिन्होंने
कैद कर रखा है
चांद
अपनी तिजोरियों में
यकीन मानो
कल
सिर्फ उनका है
जिनके हाथों धधक रहा है
आज सूरज
सच कहता हूं -
कल ऐसा ही होगा
बस
थोड़ी सी आग बांट लो।
-००-
अंतर्संबंध
मंदिर- मस्जिद के झगड़े
और
सोमालिया के भूखे मृतकों के बीच
अंतर्संबंधों को जानते हो, मित्र
राजपथ-
आज राजपथों पर छा गये हैं
नरपशु
और
जनता सुरक्षित नहीं।
-०००
एक ही स्वर
मंदिरों के श्लोक
मस्जिदों के अजान
चर्चों की घंटियों में गूंजतू
ध्वनि को पहचाना है
तुमने साथी
सुनो ध्यान से-
सदियों से गूंज रही है
एक ही आवाज,
एक नयी सुबह
जब
नहीं होगा बच्चों की आंखों में कोई खौफ
तितलियां होंगी फूलों में मशगूल
माताएं भोजन पकाने में व्यस्त
तमाम पिता कार्यरत
और
हौले से घिरती
सुहानी शाम
-००-
संघर्ष परिलक्षित
अंधेरे से उजाले के बीच
जाने का प्रयास करती
हमारी पीढ़ी का संघर्ष
क्या लक्षित नहीं कर पा रहे हो
ओ धृतराष्ट्र
या
जब
दहकती धमनियों के रक्त
की लालिमा से
प्रभासित होगा दिंगत
और
न्याय पाने हेतु
उठ खड़े होंगे
झुकी पीठ औ कमर वाले लोग,
यकीकन -
तब तुम्हारी आंख खुलेगी
धृतराष्ट्र
विश्वास करो-
मैं देख रहा हूं
भींचती मुट्ठियां
और तनते कमर
-००-
उच्छवास
मैं शब्दों से हथियार गढ़ता हूं
पूछो
उसका क्या इस्तेमाल करता हूं
उनके विरुद्ध
जिन्होंने शब्दों को कैद रखा मुट्ठियों में,
भावनाएं जिनकी क्रीतदासी हैं
इन दानवों के विरुद्ध हथियार भांजता हूं।
मैं
शब्दों से कुदाल गढ़ता हूं
कृषक श्रम-स्वेद रत
उनके निमित्त कुदाल गढ़ता हूं
मैं
शब्दों से ताप हरता हूं
संताप हरता हूं
उस श्रमिक का
जो श्रम क्लांत प्रतीक्षा में
घर लौटने की
शब्द मेरे समीप
हथियार- फूल- हास- परिहास
पर इससे बढ़कर
उस सर्जक के उच्छवास
जो तनकर खड़ा होता है
किसी रावण के विरुद्ध।
-००-
परिवर्तन
झरते हैं
फूल से शब्द-
जब मचलती है
किसी हृदय में कविता।
वे ही शब्द
धारदार अस्त्र बन उठते हैं
जब
कोई किसी का अधिकार लूटता है।
प्राणहंता बन उठते हैं
शब्द
जब
रावण किसी की अस्मिता को
अपनी अशओक वाटिका में
कैद कर लाता है।
हाहाकार मचाते आते हैं
अग्निल शब्द
और जल उठती है
सोने की लंका
वे ही शब्द
क्लांत- बेसुध
हो उठते हैं,
जब
किसी वनवासी राम
के होठों बजने लगती है सत्ता की बांसुरी
और
सीता भेज दी जाती है वनवास
शब्द
हार मान चुप बैठ जाते हैं
जब
उनमें
सत्ता का दंभ समाता है
कल उनका जिक्र
सिर्फ दस्तावेजों में होगा
जिन्होंने
कैद कर रखा है
चांद
अपनी तिजोरियों में
यकीन मानो
कल
सिर्फ उनका है
जिनके हाथों धधक रहा है
आज सूरज
सच कहता हूं -
कल ऐसा ही होगा
बस
थोड़ी सी आग बांट लो।
-००-
अंतर्संबंध
मंदिर- मस्जिद के झगड़े
और
सोमालिया के भूखे मृतकों के बीच
अंतर्संबंधों को जानते हो, मित्र
राजपथ-
आज राजपथों पर छा गये हैं
नरपशु
और
जनता सुरक्षित नहीं।
-०००
एक ही स्वर
मंदिरों के श्लोक
मस्जिदों के अजान
चर्चों की घंटियों में गूंजतू
ध्वनि को पहचाना है
तुमने साथी
सुनो ध्यान से-
सदियों से गूंज रही है
एक ही आवाज,
एक नयी सुबह
जब
नहीं होगा बच्चों की आंखों में कोई खौफ
तितलियां होंगी फूलों में मशगूल
माताएं भोजन पकाने में व्यस्त
तमाम पिता कार्यरत
और
हौले से घिरती
सुहानी शाम
-००-
संघर्ष परिलक्षित
अंधेरे से उजाले के बीच
जाने का प्रयास करती
हमारी पीढ़ी का संघर्ष
क्या लक्षित नहीं कर पा रहे हो
ओ धृतराष्ट्र
या
जब
दहकती धमनियों के रक्त
की लालिमा से
प्रभासित होगा दिंगत
और
न्याय पाने हेतु
उठ खड़े होंगे
झुकी पीठ औ कमर वाले लोग,
यकीकन -
तब तुम्हारी आंख खुलेगी
धृतराष्ट्र
विश्वास करो-
मैं देख रहा हूं
भींचती मुट्ठियां
और तनते कमर
-००-
उच्छवास
मैं शब्दों से हथियार गढ़ता हूं
पूछो
उसका क्या इस्तेमाल करता हूं
उनके विरुद्ध
जिन्होंने शब्दों को कैद रखा मुट्ठियों में,
भावनाएं जिनकी क्रीतदासी हैं
इन दानवों के विरुद्ध हथियार भांजता हूं।
मैं
शब्दों से कुदाल गढ़ता हूं
कृषक श्रम-स्वेद रत
उनके निमित्त कुदाल गढ़ता हूं
मैं
शब्दों से ताप हरता हूं
संताप हरता हूं
उस श्रमिक का
जो श्रम क्लांत प्रतीक्षा में
घर लौटने की
शब्द मेरे समीप
हथियार- फूल- हास- परिहास
पर इससे बढ़कर
उस सर्जक के उच्छवास
जो तनकर खड़ा होता है
किसी रावण के विरुद्ध।
-००-
परिवर्तन
झरते हैं
फूल से शब्द-
जब मचलती है
किसी हृदय में कविता।
वे ही शब्द
धारदार अस्त्र बन उठते हैं
जब
कोई किसी का अधिकार लूटता है।
प्राणहंता बन उठते हैं
शब्द
जब
रावण किसी की अस्मिता को
अपनी अशओक वाटिका में
कैद कर लाता है।
हाहाकार मचाते आते हैं
अग्निल शब्द
और जल उठती है
सोने की लंका
वे ही शब्द
क्लांत- बेसुध
हो उठते हैं,
जब
किसी वनवासी राम
के होठों बजने लगती है सत्ता की बांसुरी
और
सीता भेज दी जाती है वनवास
शब्द
हार मान चुप बैठ जाते हैं
जब
उनमें
सत्ता का दंभ समाता है
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