Thursday, July 30, 2009

मित्र

( मित्रता दिवस पर विशेष)
मित्र

अंधेरे में साथी जब
सूझती नहीं है राह
भय से
लरजते कांपते हैं पैर
सामने घना अंधेरा
राह अदृश्य।
सामने कौन- कैसा
पहचानना
मुश्किल।
वाकई घना है
अंधेरा,
दिन के उजाले में
भी
पहचानना मुश्किल
कई बार
अपने तक को ?
चेहरे की लकीरें
ढंक लेती हैं
नहीं पहचानने देती हैं
सही चेहरे, सही रास्ते, सही लोग।
वाकई
चेहरों को पहचानना
काफी कठिन होता है
कारण
अक्सर
हम खुद से भी
कतराते हैं
ऍसे में
साथी
कह पाना मुश्किल होता है
क्या
हम आदमी हैं ?
प्रश्न अनुत्तरित -
आओ
उत्तर ढूंढे
मिलकर हम-तुम
-०-
कमलेश पांडेय

Wednesday, July 29, 2009

तुम चुप क्यों हो ?

तुम चुप क्यों हो -
लंबे अरसे से
सोचता हूं मैं
वजह क्या है
होठों के सिले होने की
कई बार
मैंने देखा है
आंख मूंद कर
निकल जाते हैं हम
अपने साथ के लोगों को
बेचैन छोड़
उनकी अपनी पीड़ा के साथ
हमें भी तो
अपने सलीब ढोने पड़ते हैं
कई- कई ईसा
अपने सच को
ताजिंदगी
ढोते रह जाते हैं।
लहूलुहान आत्मा
को नहीं मिलती कोई राहत।
सच है-
जीवन आज सलीब बन चुका
और
सिसिफस की भांति शापित
हम सब
दुःखों को परवान
चढ़ाते रहते हैं।
दुःख तेरा हो या मेरा
वाकई
शिला सम भारी होता।
अक्सर वह
हमारे आंसुओं
हमारे होंठों
पर
टंगा होता।
-०-
कमलेश पांडेय

Tuesday, July 28, 2009

संकल्प

संकल्प

जिंदगी
क्यों इस कदर बदरूप होती जा रही ?

कल तक जिनके चेहरे थे
जाने -पहचाने

अचानक
उन चेहरों पर उभर आईं हैं
ऐसी लकीरें
जिन्हें देख
भेड़ियों का ख्याल उभरता है।

आदमी
अब
क्यों नहीं दिखता
सहज इन्सान की भांति

चारों ओर दिख रहे हैं
सिर्फ
रीछ, भालू, मगरमच्छ, घड़ियाल

जाने कहां
खोया है
एक आदमी। 

भयावह कंक्रीट के जंगल
में सांसें हैं
कहां गुम ?

एक फूल
एक मुट्ठी हवा
पकड़ने को बेताब
बच्चा
कूदते कूदते
थक हार गया

आंसू भी थम गये
सपने भी। 

कल
ऐसा न हो
आओ
हम संकल्प लें।

कमलेश पांडेय

Monday, June 29, 2009

सुबह

कई बार
नयी सुबह की प्रतीच्छा करते
रह जाते हैं हम
घोर अंधियारे में
नहीं सूझता
किस दिशा में है सही राह।
अंधेरे में ठोकर खाते
उलझते - गिरते
उलझाते - गिराते
बढ़ते जाते हैं हम।
सच -
अंधेरा घना, औ आंख में टंगे
रूपहले ख्वाब
बदरंग दुनिया
के स्याह रंग इतने मोहक
नहीं दिख पाती
वह संकरी पगडंडी
जो ले जाती
अंधेरी घाटी से दूर
नयी सुबह के उगते सूरज के पास।
सूरज औऱ सुबह
मिले
वहां हमें हमारी मुट्ठियों में ही
बस
हमने चलना चाहा
थोड़ा झुकना सीखा।
कमलेश पांडेय

Sunday, June 28, 2009

बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद
एक बार फिर कूकी कोयल
चुप बैठा काक भी कुछ बोला
टूटी मनहूस छायी चुप्पी
बोला
कुछ तो बोला।
पर तुम हो क्यों चुप
होंठ हैं क्यों सिले ?
आंखों से उतर खामोशी
जिह्वा तक है क्यों फैली ?
चुप रहना
न कुछ कहना
भला, यह भी कोई बात हुई -
कहते हैं -
न कुछ बोलो
तब भी
बोलती हैं आंखें
खोलती हैं राज आंखें
पर पत्थर सी बेजान आंखें
और
कस कर सिले होंठ
सच बताओ
साथी
तुम नये युग के इन्सान तो नहीं ?

Saturday, March 14, 2009

साहित्‍य को समर्पित